रविवार, 8 जनवरी 2012


रविवार, ८ जनवरी २०१२


ब्लागर्स मीट में रहा विचार का तेज, गजलों की ताजगी

रांची.जन सरोकारों से जुडी ख़बरों और विमर्श के लिए ब्लॉग बेहतर विकल्प ज़रूर है लेकिन उसके खतरे भी हैं.अभिवयक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे.राजधानी स्थित एटीआइ के व्याख्यान कक्ष में हुए ब्लोगेर्स मिलन में यह बातें निकल कर सामने आयीं.इसके अलावा गजलों और कविताओं की रिमझिम बारिश भी होती रही.कनाडा से आई ब्लागर व कवयित्री स्वप्न मञ्जूषा अदा के सम्मान में इसका आयोजन आह्वान नामक सांस्कृतिक संस्था ने किया था.रांची, बोकारो, धनबाद और खूंटी के ब्लागर्स और वर्चुअल स्पेस में लिखने वाले रचनाकारों ने इसमें शिरकत की.

विषय परिवर्तन करते हुए ब्लागर व पत्रकार विष्णु राज गढ़िया ने कहा कि नेट पर निसंदेह ख़बरों और विचारों का एक बूम है . अच्छे लिखने वाले भी हैं तो कहीं स्तरहीन लेखन से भी सामना होता है.ज़रुरत उसे एक सही दिशा देने क़ी है.फ़िज़ूल की बहस में पड़े बिना वैकल्पिक मीडिया की तलाश जारी है.वहीँ ब्लागर व पत्रकार देवेन्द्र गौतम ने विष्णु का समर्थन करते हुए कहा क़ी वर्चुअल स्पेस कल की पत्रकारिता का वैकल्पिक माध्यम है.उन्होंने बिहार झारखण्ड में ब्लागर्स के संगठन पर बल दिया.ब्लागर व कवयित्री रश्मि शर्मा ने कहा क़ि सम्प्रेषण के लिए उन्होंने ब्लाग्स को चुना.बाद में लोग मिलते गए और कारवां बढ़ता गया.कवि-लेखक रणेंद्र का कहंता था क़ि ब्लाग्स महज़ स्वांत सुखाय लेखन नहीं है.वर्चल जगत इन दिनों कई बदलावों का वाहक बना.हमें उसकी ताक़त का सही इस्तेमाल करना है.ब्लागर राजीव थेपडा ने अच्छे लेखन के साथ बेहतर इंसान बनने पर जोर दिया.रंगवार्ता के संपादक अश्विनी पंकज ने कहा क़ि वर्चुअल स्पेस का हमें वाजिब इस्तेमाल करना चाहिए.ब्लागेर्स को अपनी संस्कृति, प्रकृति और प्रवृति पर विचार करना चाहिए.सही जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए.सामाजिक परिवर्तन में ब्लाग्स अच्छी भूमिका निभा सकता है.ब्लागर व शायर क़सीम अख्तर ने शायराना लहजे में अपनी बात कही.वहीँ ब्लागर व ज्योतिषाचार्य संगीता पुरी ने ज्योतिष को विज्ञान बताया.उन्होंने कहा क़ि उनके ब्लॉग का मकसद इसी का प्रचार करना है.रात अभी बाकी है, चिराग सहर तक जलने दो, ब्लागर व कवयित्री रजनी नैय्यर मल्होत्रा की इस ग़ज़ल को खूब दाद मिली.सम्मलेन की ख़ास मेहमान स्वप्न मञ्जूषा अदा ने कहा क़ि उनकी यह पहली ब्लाग्स मीट है.लेकिन बहुत ही सफल है.उन्होंने अपने मधुर स्वर में अपना एक गीत भी सुनाया: दूर के ढोल सुहावन भैया, दिन-रात यही गीत गावत हैं/ फ़ौरन आकर हम तो भैया बहुत बहुत पछतावत हैं .कार्यक्रम का संचालन शहरोज़ कमर ने और धन्यवाद ज्ञापन नदीम अख्तर ने किया.इस अवसर पर अरुण कुमार झा, कामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव निरंकुश, दिलीप तेतरवे, आरती, संजय कृष्ण और नवीन शर्मा आदि मौजूद थे.
-- नदीम अख्तर
द पब्लिक एजेंडा
9835193065
9852909234

मंगलवार, ३ जनवरी २०१२

असली नेता की प्रतीक्षा में है झारखण्ड


अरुण कुमार झा

ranchi drishtipat dece 11
पथ भ्रष्ट झारखंड की राजनीति के छः धुरन्धरॊ मधु कोड़ा, कमलेश सिंह, भानु प्रताप शाही, एनोस एक्का एवं हरिनारायण राय की दुर्दशा देखकर झारखंड के आम आदमी अपने को झारखंडी कहने में लज्जित होता है। लेकिन वहीं दिशाहीन झारखंड के नेताओं को इसकी कोई ग्लानि नहीं है। भारत में कोई दूसरा प्रान्त नहीं है, जहाँ छः पूर्व मंत्राी एक साथ जेल में जीवन बीता रहे हों। मधु कोड़ा का तो कई रिकार्ड जग जाहिर है। एक रिकार्ड यह भी है कि पूरी दुनिया में मधु कोड़ा ही है, जिस पर निगरानी, सीबीआई, आईटी और इडी का एक साथ मुकदमा चल रहा है। यह सब दुर्भाग्य झारखंड को विरासत में मिला है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ये छः पूर्व मंत्री ही पथभ्रष्ट और चोर हैं, ये तो पकड़ में आ गये। जो पकड़ में नहीं आये हैं, वो साधु हैं, ऐसा नहीं है। वर्तमान मंत्रिमंडल में एक महत्वपूर्ण विभाग के महत्वपूर्ण आदिवासी मंत्री तो जमीन के आकर्षण में इतने आसक्त हैं कि इन्हें कानून और अपने पद की गरिमा का ख्याल भी नहीं रहा। ये मर्यादाविहीन राजनेता स्वार्थ और लालच के दलदल में इतने गहरे उतरे हुए हैं कि इन्हें भला-बुरा की मर्यादा भी नहीं सूझती। झारखंड में ऐसे दर्जनों भ्रष्ट आचरण के नेता हैं, जो वर्तमान में प्रदेश की रहनुमाई में लगे हुए हैं। उसी प्रकार दर्जनों भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, जो डा0 प्रदीप कुमार की राह पर ही चल रहे हैं। यहाँ यह कहने में हमें जरा भी संकोच नहीं होता कि नेता-अधिकारी के साथ-साथ कई घाघ मीडियाकर्मी भी भ्रष्टाचार के पोषण में दिन रात लगे हुए हैं। झारखंड का जिस दिन सौभाग्य जगेगा, उस दिन ये सारे नेता और अधिकारी और मीडिया वाले भी जेल में जीवन बीता रहे होंगे। लेकिन इसके लिए जरूरत है, निष्पक्ष और स्वच्छ जाँच एंजेसी की, जो ईमानदारी पूर्वक इनकी भ्रष्ट गतिविधियों की जाँच करे।
झारखंड के उदय के साथ ही इस प्रदेश को लूटखण्ड के रूप में बदल दिया गया। एक तरफ झारखंड विधनसभा का प्रथम अध्यक्ष इंदर सिंह नामधरी, तो दूसरी तरफ मंत्रिमंडल के मुखिया बाबूलाल मराण्डी, दोनों ने मिल कर अपने अपने महकमे में भ्रष्टाचार की ऐसी खेती की, भष्टाचार का ऐसा रक्त-बीज बोया, जो अब तक, अपना जलवा दूर-दूर तक दिखला रहा है, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण इस देश में नहीं है।
‘स्वार्थ और लालच’ झारखंड की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। यही स्वार्थ और लालच झारखंड के माननीयों को कर्तव्यच्युत और पथभ्रष्ट कर रहा है। झारखंड की 85 प्रतिशत जनता को दोनो समय का भरपेट भोजन और तन पर पूरा कपड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन माननीय जी को विलासिता की सारी सुविधएँ चाहिए। मानो झारखंड इन्हीं के लिए वरदान स्वरूप बना है। जनता के खून पसीने की कमाई पर इनका सनातन हक कायम हो गया है, ये जैसे चाहें, खजाने का उपभोग करते हैं। यह सब तब तक चल रहा है, जब तक कि झारखंड को कोई नेता नहीं मिला है, जिस दिन झारखंड को असली नेता मिल जायेगा, हमें इसकी आशा करनी चाहिए, उसी दिन झारखंड का असली उदय होगा।
अरुण कुमार झा , प्रधान संपादक

बृहस्पतिवार, 19 मई 2011

हवा के साथ


जब से सूरज निकला

जब तक नहीं डूबा

दोड़ता रहता है पैर

बाँसों पर, तनी हुई रस्सियों पर

तारों पर।

थम जाती है साँस

खिंचती आती आँत

धीरे-धीरे

पीठ के आस-पास

बंध जाती है दृष्टि

एक पूरी उम्र

खिंच-खिंच कर

न्यूनतम हो जाती है जैसे!

-- डॉ. शिवशंकर मिश्र


रविवार, 8 मई 2011

खुशबू की ह्त्या का असली दोषी कौन?

दियों से आज तक शिक्षा सामाजिक, मानसिक, सांस्कृतिक उन्नति का आधार न होकर सिर्फ आर्थिक आधार बनी हुई है। हम अपने बच्चे को अच्छी-से-अच्छी शिक्षा (?) देने-दिलाने की होड़ में लगे हुए हैं, लेकिन यहाँ हम यह भूल जाते हैं कि जो शिक्षा हम अपने बच्चे को दिलवाने जा रहे हैं, वह क्या सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक रूप से हमारे जीवन के लिए समृद्धि का आधार बनेगी? वह क्या सामाजिक, मानसिक और सांस्कृति उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करेगी? या सिर्फ एक पैसा-कमाऊ मशीन बनाएँगी? यहाँ पर यह देखना हमारा धर्म और कर्त्तव्य हो जाता है, लेकिन यहीं पर आकर हम बूरी तरह मार खा जाते हैं, परिणामस्वरूप जीवन भर हजारों-हजार परिवारों का मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आधार कमजोर पर जाता है। यही कमजोर सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक पहलू हमारे जीवन में तरह-तरह से विभिन्न रूपों में उपद्रव करते रहते हैं।
हम शब्दों की कलाबाजी में न पड़कर सीधे-सीधे इस तथ्य को स्वीकार कर इस पर विचार करें- कि सभी वर्ग-समाज में अविभावकों और बच्चों के बीच संवादहिनता की जो खाई चौड़ी होती चली जा रही है, उसे कैसे कम किया जाए। यह खाई एक दिन और कुछ साल में नहीं चौड़ी हुई है, इसमें हजारों हजार साल लगे हैं। यह सभ्य समाज के लिए कतई स्वास्थ्यकर नहीं हो सकता। इस खाई को हम कैसे कम कर सकते हैं? यह प्रश्न हमारे समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुई है। इस चुनौती को स्वीकार किये बगैर हम अपने बच्चे को नहीं बचा सकते। कितनी ही खुशबू की सर धड़ से अलग किय जाते रहेंगे और लाखों विजेन्द्र जेल के अन्दर होते रहेंगे। ऐसी स्थिति सभ्य समाज के लिए शर्मनाक तो है ही, लेकिन इससे ज्यादा शर्मनाक और अपराधी तो वह समाज और व्यक्ति है, जो ऐसी स्थिति उत्पन्न करने में प्रेरक का काम करते हैं। अपनी झूठी शान-शौकत को मान-मर्यादा का जामा पहनाकर सभ्य और सुसंस्कृत कहलाते हैं। इनकी झूठी शान को बनाए रखने के डर से बच्चे विपरित परिस्थिति में तय नहीं कर पाते कि उन्हें क्या करना चाहिए! इसका एक महत्वपूर्ण पहलू एक दुःखद घटना के रूप में सामने आया-
पिछले दिनों राँची के एक शिक्षण संस्थान-परिसर में खुशबू कुमारी नामक इंटर की छात्रा को परीक्षा हाल से निकलते ही विजेन्द्र नामक एक युवक, जो खुशबू का प्रेमी था, ने खुखरी से उसके सर को धड़ से क्षण में ही अलग कर दिया। (यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि इस घटना से किसी संस्थान की सुरक्षा असुरक्षा का प्रश्न नहीं उठता। यह घटना यहाँ नहीं घटती तो कहीं और घटती) इस घटना ने हमारे सभ्य समाज को अपने गिरेवाँ में झाँकने का अवसर दिया है। यदि अभी भी हम नहीं चेतते तो सिर्फ कानून की और सुरक्षा की बात पर उलझ कर हम अपने को धोखा देते ही रहेंगे।
इस घटना के पीछे की जो मानसिकता काम करती है, उस बिन्दु पर हमे गहन विमर्श करने की जरूरत है। खुशबू कुमारी और विजेन्द्र के बीच प्रेमभाव हिलोरे मार रहा था, उसे क्या दोनो परिवारों ने कभी महसूस किया? यदि किया तो क्या दोनो परिवार के बीच इस मामले पर कभी बाते हुईं? यदि हुई तो क्या निर्णय हुआ बच्चों के पक्ष और विपक्ष में? दूसरा यह कि खुशबू कुमारी के अविभावक खुशबू से इस बावत कभी कोई संवाद कायम किया, उसकी भावना को समझने की कोशिश की? क्या खुशबू की रजामंदी से उसकी शादी दूसरी जगह तैय की गयी? विजेन्द्र के अविभावक अपने पुत्र से कभी इस मामले में बातें की? उसके मनोदशा पर गौर किया? या खुशबू के अविभावक उनके प्रेम मामले में विजेन्द्र के अविभावक से कभी इतने महत्वपूर्ण मामले में गंभीरता दिखलाई? निश्चित रूप से नहीं! ऐसा नहीं हुआ? यदि ऐसा होता तो शायद यह दुःखद घटना कभी नहीं घटती! इससे साफ जाहिर होता है कि हमारे अविभावक इस मामले में ज्यादा दोषी हैं। जब तक हम शिक्षा के मूल उद्देश्य को छोड़कर उसके इर्द-गिर्द भटकते रहेंगे तब तक लाखों विजेन्द्र समाज और कानून की नजरों में अपराधी के सिवा कुछ भी नहीं होगा। और ऐसी लाखों खुशबूएँ अविभावक के अंहकार की वेदी पर कुरबान होती रहेंगी।
ठीक इसके उलट राँची जिला स्थित खिजरी के विधायक सावना लकड़ा ने अपनी भगिनी के प्रेमी को मार डाला। पहले अपरहण किया फिर उसे अपने बॉडी गार्ड के साथ मिल कर गोली मार दी। दोनो घटनाओं के केन्द्रबिन्दु में एक ही मानसिकता काम करती है। घटना स्थल और परिस्थितियाँ थोड़ी भिन्न जरूर है, एक दूसरे से। एक हत्यारा विजेन्द्र कच्ची उमर का है और अनुभवनहीन भी और वहीँ दूसरा हत्यारा सावना लकड़ा जो कानून बनाने में मदद करता है, अनुभवी भी है, फिर ऐसी घटना को जानते-समझते हुए अंजाम देता है।
यह विषय समाज विज्ञानी के लिए शोध का विषय हो सकता है और निश्चित रूप से ऐसे विषयों पर हजारों शोध् हुए भी होंगे, लेकिन ऐसे शोध ग्रन्थ सिर्फ अलमारी की शोभा के लिए होते हैं और सिर्फ डिग्री हासिल करने के लिए, न कि समाज को फायदा पहुँचाने के लिए। तो फिर ऐसी शिक्षा का क्या मोल? क्या हम इस पर पुनः विमर्श कर सकते हैं?
अरुण कुमार झा

बृहस्पतिवार, 14 अप्रैल 2011

अत्याचारी वयवस्था का कहर

गुलामी व्यवस्था को भी शर्मसार करने वाली आजाद भारत की अत्याचारी व्यवस्था ने पिछले दिनों झारखंड की राजधानी राँची के इसलामनगर में जो कहर बरपाया, राँची के इतिहास का एक काला पन्ना ही साबित हुआ।

इसलामनगरवासियों का सिर्फ इतना दोष था कि वे पोलिटेकनीक की जमीन पर अवैध् रूप से बसे हुए थे। जितना इनका दोष अवैध् रूप से बसने में था, उतना ही दोष उन्हें बसाने में सरकारी तंत्रा का भी था। हमारी व्यवस्था के तीनों अंगों ने कानून और जनहित का वास्ता देकर 30 हजार जनों के साथ जो अमानवीय अत्याचार किया, जनअहित किया, उसे टाला भी जा सकता था, और अतिक्रमण मुक्त भी किया जा सकता था, लेकिन जब व्यवस्था अहंकारी और विवेकहीन हो जाये, तो ऐसी ही स्थिति पैदा होती है।
दृष्टिहीन और अमानवीय व्यवस्था के आदेश का पालन जब बर्बर तरीके से किया जाये तो लोक-कल्याण की बुनियाद पर खड़ी व्यवस्था बेईमान ही साबित होती है। इसका उदाहरण इसलामनगर के रूप में हमने देखा कि प्रशासन और कानून के दो पाटे में फँसी जनता कैसे गूँगी और लाचार बन गयी थी।
इसलामनगर की 30 हजार जनता की ओर से 2 हजार लोग जब सूबे के मुखिया के यहाँ फरियाद लेकर पहुँचे तो मुखिया के मुँहचोर प्रधान सचिव डी0के0 तिवारी ने अपना मुंह छिपाते हुए एक कम हैसियत और अनुभवहीन संयुक्त सचिव को वार्तालाप के लिए भेजा, साथ में मुखिया के संसदीय सलाहकार संवेदनहीन अयोध्यानाथ मिश्र, जो किसी को कोई मदद करने की ताकत भी नहीं रखते, उस वक्त वहाँ उपस्थित हुए, लेकिन पता नहीं इन्होंने अपने मुखिया को कैसी सलाह दी कि दूसरे ही दिन कल्याणकारी सरकार का काला चेहरा बुलडोजर के रूप में इसलामनगर में हाजिर हो गया? सलाहकार और उन अधिकारी को जनता पर इतना भी भरोसा और धैर्य नहीं था कि वे कुछ दिनों की मोहलत के लिए सरकार को सलाह देते, शायद उन्हें लगा कि ये लोग जमीन लेकर कहीं उड़ जायेंगे।
निराश हो, इसलामनगर के लोग भारी मन से ही सही अपने-अपने तरीके से अपने घरों को खाली कर दूसरा ठिकाना ढूँढने में लग गये थे, कुछ लोग तो घर खाली कर चले भी गये थे, लेकिन उसी बीच वोट के भूखे राँची के सांसद सुबोध कान्त सहाय इसलामनगरवासियों को अपने बहकावे में लेकर अपना उल्लू सीध करने में जुट गये। साथ ही इनकी शह पर कूद कर मीडिया कर्मियों को भी पीटा गया। परिणाम स्वरूप पुलिस मुठभेड़ में दो व्यक्ति मारे गये और दर्जनों घायल हुए। ऐसे नेता पर क्या आपराधिक मामले नहीं चलने चाहिए? या क्या कोर्ट की अवमानना उन्होंने नहीं की? सबसे बड़ी दुर्भाग्यजनक बात तो यह हुई कि ऐसे मौके पर न किन्ही गैरसरकारी संगठनों (मुस्लिम संगठन को छोड़कर) ने न ही मानवाधिकार की दुहाई देने वालों ने उजड़े हुए लोगों के लिए कोई राहत शिविर लगाया, न ही कोई उनके दुखते हुए हृदय को तसल्ली देने पहुँचा। मानवता कितनी शर्मसार हुई, इसका दूसरा उदाहरण शायद ही और मिले राँची के इतिहास में।
अरुण कुमार झा
प्रधान संपदक

बृहस्पतिवार, 23 सितम्बर 2010

मुन्नी के झंडूबाम होने का रहस्य!


विजय रंजन

मुन्नी के झंडूबाम होने की चर्चा देखते-ही-देखते जंगल में आग की तरह फैल गयीं सब के जुबान पर यही था कि मुन्नी झंडूबाम हो गयी। सारे देश में लोग नाच रहे थे, गा रहे थे- ‘‘मुन्नी के झंडूबाम होने का जादू लोंगों के सिर पर चढ़कर बोलने लगा। हालात यह हो गयी कि लोग अपने-अपने रूमाल में इत्रा की जगह झंडूबाम लगाने लगे। राह चलते लोग रिक्शे वाले से भी खैनी मांगने से जिस तरह नहीं शरमाते, उसी तरह हाथ बढ़ा कर लोग कहते- ‘भइया, जरा अपनी रूमाल तो देना, झंडूबाम का मजा ले लें।’’
‘तीज’ पर्व के पहले मैंने अपनी पत्नी से पूछा, ‘‘क्योंजी इस बार कैसी साड़ी लेनी है?’’
पत्नी थोड़ा इठलाती हुई बोली, ‘‘सुनियजी, इस बार साड़ी छोड़ दीजिए। मुझे झंडूबाम ला दीजिए’’ मुन्नी का झंडूबाम होने का असर कुछ इस तरह पड़ा कि नौकरानी जब ठीक ढंग से काम नहीं करती, तो मालकिन, नौकरानी को डांटने लगती है, ‘‘क्यों री आजकल काम में मन नहीं लगता। झंडूबाम हो गयी क्या?’’
मुन्नी के झंडूबाम होने का असर युवा वर्ग पर भी पड़ा। कालेज में लड़कियाँ कुछ इस तरह बातें करने लगीं, ‘‘जानती हो पलक, अंकिता जब से सुबू से मिली, क्या कहने! वो तो झंडूबाम हो गयी।’’
अब चाहे जो हो, मुन्नी के झंडूबाम हो जाने का असर अमिताभ बच्चन पर भी पड़ा। अमिताभ बच्चन वर्षों से लोगों के सिर पर नवरत्न तेल लगाते-लगाते थक गये, पर लोगों का सिर दर्द खत्म नहीं कर सके। पर मुन्नी जब से झंडूबाम हुई, लाखों लोगों का सिर दर्द खत्म हो गया।
वैसे मुन्नी के झंडूबाम होने का बाजार जोरों पर है। चर्चा में है कि मुन्नी पहले ‘‘चल छैयाँ, छैंयाँ करते-करते लोगों की नजरें चुरा लेती थी। कुछ लोग कहते हैं कि मुन्नी वर्षों पहले ‘यूपी-बिहार’ लूटने की कोशिश कर चुकी है। लोग मानते हैं कि मुन्नी किसी ठिकाने पर ज्यादा दिन तक नहीं टिकती। कई बार वह पड़ोसी के चूल्हे से आग लेते पकड़ी गयी। जवान लड़कों के दिलों में काँटा चुभाती पकड़ी गयी। यहाँ तक कि टेन, बसों में अपने जिगर की आग से बीड़ी सुलगाती पकड़ी गयी। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मुन्नी अचानक झंडूबाम कैसे हो गयी। सच कि झूठ कौन जाने! लोग दबी जुबान में कहते हैं कि मुन्नी लालू यादव के मोहब्बत में आकर झंडूबाम हो गयी। कुछ लोग इससे सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि चुलबुल पाण्डेय के प्यार में मुन्नी पागल हो गयी। चुलबुल पाण्डेय मुन्नी को झारखंड ले आया और राजनीति के नंगे राजनीतिज्ञों के हमाम में मुन्नी को डाला गया। मुन्न उसमें से जब निकली, तो झंडूबाम हो गयी।
अब चाहे जो हो, मुन्नी के झंडूबाम होने के रहस्य पर से पर्दा उठाना, ब्रह्माण्ड के रहस्य पर से पर्दा उठाने के समान है। देश-विदेश के करोड़ों लोग जानना चाहते हैं कि मुन्नी आखिर झंडूबाम कैसे हो गयी!

सोमवार, 28 दिसम्बर 2009

झारखंड का ख‍ंडित जनादेश ः दोषी कौन

प्रिय पाठकों दृष्टिपात का दिसम्बर अंक अपरिहार्य कारणों से निर्धारित समय पर प्रकाशित नहीं हो पाया। अब, चूँकि झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम भी आ चुके हैं। इस बार के संपादकीय हम इसी पर दे रहे हैं, आप हमें अपनी प्रतिक्रिया दें, और बताएँ कि आपको पत्रिका कैसी लगती है। खैर! अब हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं।
एक तरफ लोग एक्समस मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तो दूसरी ओर नये वर्ष के स्वागत की तैयारी में लगे हैं। वहीं तीसरी ओर कैमरे में बंद निगेटिव प्रिन्ट का पोजिटिव रूप सामने आ गया है। वही ढाक के तीन पात! कांग्रेस गठबंधन-25, भाजपा गठबंधन-20, आरजेडी-5, जेएमएम-18, निर्दलीय व अन्य-13। अब बताइए कैसे बने सरकार!
नता इनकी कलाकारी एवं कलाबाजी से थक-हार गयी है। वह इस लिए कि वह कुछ नहीं कर सकती। जनता इस बात को जानना चाहती है कि भ्रष्टचार से लड़ने के लिए किसी एक को अर्जुन बन कर पी.आइ.एल का तीर चलाना होगा। भ्रष्टाचारी क्या पी.आइ.एल के जरिए ही कानून के गिरफ्त में आयेंगे? यदि कोई पीआइएल न जाये, तो क्या जनता के ये रखवाले मतवाले हो, बाड़ को चरते रहेंगे? अभी तक इसका उत्तर हाँ में ही है। यानि सरकार का काम आँख, कान बंद करके रखना है, जब तक कि कोई पीआइएल की मिर्ची आँख में न डाले! सवाल यह भी है कि क्या जीत कर आये हुए लोग सही में हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं? यदि मान लिया जाए कि 50-60 प्रतिशत मतदान होते हैं, तो इसका सीधा अर्थ है कि 40-50 प्रतिशत लोग इस मतदान में शामिल नहीं हैं। और फिर यदि 50-60 प्रतिशत मतदान में 4-5 उम्मीदवार की मुख्य हिस्सेदारी होती है और फिर 20-30 प्रतिशत
सरकार शायद जेएमएम, भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दल के साथ मिलकर बन भी जाये, लेकिन यह सिद्धांतहिन राजनीति झारखंड का कितना भला करेगी, आने वाला समय ही बताएगा, पर पेट की आग में झुलस रही झारखंड की गरीब जनता को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है। शहरी मतदाताओं की मतदान के प्रति उदासीनता इस ओर ध्यान दिलाती है कि
ज मत पाकर वह विजयी कहलाता है, तो सही अर्थों में वह अपने क्षेत्र के 20-30 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। तो क्या इसके लिए हमें या सरकार को कुछ करना नहीं चाहिए? ऐसी दशा में लड़ी गयी स्वतंत्रता की लड़ाई से भी महत्वपूर्ण हो गया है वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ने का। लेकिन क्या हम जंग छेडेंगे? उत्तर है, नहीं छेडेंगे। क्योंकि हम मरे हुए है। हमारा समाज मुर्दा हो गया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो बार-बार इन राजनीतिज्ञों की सीढ़ियों पर हमारा मत निलाम नहीं होता, खंडित जनादेश नहीं आते। हमारी बेईमानी हर बार चुनाव के वक्त सामने आ जाती है। और हम सिद्धांतहिन राजनीति के शिकार हो जाते हैं। ये सब क्या हो रहा है? क्या संकेत दे रहा है? राजनीति की पतन का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। इसके लिए दोषी कौन है, जनता या ये घोटालेबाज नेता? या इस प्रदेश के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थतियाँ? चिंतक और विचारक चिंतित है। इतिहासकार चिन्तित है कि वे झारखंड का इतिहास क्या लिखे? हमारी कलम भी तो रूक रही है, सोच रहे हैं कि आगे क्या लिखा जाये, लेकिन हमारा मरा हुआ समाज चिंतित नही लगता?

अरूण कुमार झा
प्रधान संपादक

बृहस्पतिवार, 3 दिसम्बर 2009

दुनिया का सबसे बडा घोटाला

गुरुवार, ३ दिसम्बर २००९

झारखंड के निवाला चोर

सवाल इस बात का नहीं है कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की सम्पत्ति 2000 करोड़ की है या 4000 करोड़ की या इससे भी कहीं ज्यादा। सवाल यह भी नहीं कि मधु कोड़ा के कितने ठिकाने हैं, किन-किन ठिकानों में क्या मिले। यह भी सवाल नहीं है कि उन्होंने कितने और किन-किन देशों में किस-किस के माध्यम से खरीदारी की या खपाये। सवाल यह भी नहीं है कि उनके होटल ज्यादा है कि घर या जमीन-जायदाद या खदानें या रिसोर्ट या और कुछ। सवाल यह भी नहीं है कि उनके गिरोह के कितने चेहरे सामने आये और कितने चेहरे छुपे हुए हैं। सवाल यह भी नहीं है कि 64करोड़ का वोफोर्स घोटाला, 1.60करोड़ का दूर संचार घोटाला, 950करोड़ का चारा घोटाला, 135 करोड़ का ताज कोरिडोर घोटाला से मधु कोड़ा एण्ड कम्पनी का घोटाला कितना बड़ा है। सवाल यह है कि राज्य का मुखिया, राज्य की जनता का प्रतिनिधि राज्य की जनता का खेवनहार कैसा हो? सवाल यह है कि ये तमाम पैसा मधु कोड़ा के पसीने की कमाई नहीं है। जनता के पसीने की कमाई है। वड़ी कम्पनियों ने अपने हित में काम करवाये। कोई भी लाखों-करोड़ों से मधु कोड़ा पर अर्पित किये होंगे, तो निश्चय ही करोड़ों से ऊपर की कमाई का लक्ष्य भी उनका रहा होगा। न ही व्यापारियों ने, न ही कोड़ा एण्ड कम्पनी ने झारखंड का हित देखा, न ही झारखंड की जनता का हित देखा। पैसे के सामने जनता का हित दब गया और व्यक्तिगत हित सर्वोपरि हो गया। आदिवसी हितों के लिए झारखंड बना, आदिवासी हितों के लिए जार-जार रोने वाले नेताओं ने आदिवासियों के आँसू और खून बेच दिए। 680 दिन में सड़क से अरबपति बनने वाले मधु कोड़ा की इच्छाएँ, आकाक्षाएँ इतनी ऊँची होगी, किसी केा पता भी नहीं चला। यह तो समय ही बताएगा कि जनता को बेचकर अरबपति बनने का रिकाॅर्ड क्या यही बड़ा होगा या यह रिकाॅर्ड भी टूटेगा? सितम्बर 2006 में एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा के हाथों में सत्ता आयी, तो किसी को क्या पता था कि उनके हाथों में सत्ता भ्रष्टाचार के कालीन पर चढ़कर आयी है। और वे इस भ्रष्टाचार के कालीन में सोने-चाँदी और हीरे की कशीदाकारी करेंगे। अब जनता को ये बात समझ में आ रही है कि कांग्रेस, झामुमो और राजद क्यों मधुकोड़ा के सामने हार लेकर खड़े थे। क्यों ये तथाकथित बड़ी पार्टियोें से लेकर निर्दलीय तक मधु कोड़ा के सामने नतमस्तक थे। जाहिर है अपने पूर्व के मंत्रित्त्व काल में उन्होंने जो कमाई की थी, उसे ही बिछा दिया था, जिस पर चलकर ये लोग मधु कोड़ा की सरकार बनाने आये थे। जाहिर है, जो नंगा खड़ा हो उसके सामने नंगा खड़ा होने में क्या लाज! इसी का नतीजा हुआ कि बंधु तिर्की, कमलेश कुमार सिंह, भानू प्रताप शाही, दुलाल भूईंया, चन्द्रप्रकाश चैधरी, एनोस एक्का जैसे तमाम लोगों ने मधु कोड़ा के साथ मिल कर नंगा नाच किया। झारखंड अलग राज्य बना, तो आँकड़ों के अनुसार सत्ता भाजपा की झोली मंे आ गिरी। भाजपा को एक ऐसा आदिवासी नेता की तलाश थी, जो उसके अनुसार चले। वो नेता सीधे-सादे आदिवासी हो तथा भाजपा के उस मिथक को भी तोड़े, जो उसके साथ जुड़ा था कि यह व्यापारियों की पार्टी है। इस बिन्दूओं बाबूलाल मरांडी खरे उतरे और उनके हाथों में सत्ता आ गयी। पर सत्ता मिलते ही वे सत्ता के मद में बौरा गए। और पार्टी से अलग हट कर अपनी कार्यशैली अपना ली। मनमानी करने लगे और भ्रष्टाचार के बीज भी बो दिये। झारखंड के सरकारी सिस्टम में। बाबूलाल मरांडी ने दलाली और ठेकेदारी प्रथा की परम्परा कायम की, साथ-ही-साथ डोमिसाइल जैसे आगलगाऊ घटना को अंजाम तक पहँुचाया। परिणामस्वरूप उन्हंें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। बाद में अर्जुन मुण्डा आये फिर उसके बाद मधु कोड़ा। सभी ने बाबूलाल मरांडी द्वारा विकसित की गयी ठेकेदारी और दलाली की परम्परा को जिन्दा रखते हुए वे भ्रष्टचार को मान्यता प्रदान की। जिसका परिणाम हुआ कि मधु कोड़ा के आते-आते भ्रष्टचार के बीज एक वटवृक्ष बन गया। बीच के जो भी पात्र थे, वे सत्ता-सुख और भ्रष्टचार की चादर ओढ़कर राज करते रहे। सुदेश महतो जैसे मंत्रियों ने कमाई भी की और बारात की पार्टी जम कर खाई और धीरे से खिसक लिए। झारखंड की सड़कों की हालत देखकर झारखंड की जनता सुदेश महतो पर ऊँगली तो उठाती है, पर कुछ बोल नहीं पाती। झारखंड की जनता करे भी तो क्या करे। झारखंड की विधानसभा के भ्रष्टाचार के किस्से, कारनामे तो सबकी जुबां पर है। झारखंड की विधानसभा अध्यक्षों द्वारा की गयी मनमनानी नियुक्ति, उपहार बाँटने और अपने मनमुताबिक किये गये खर्चे और बेहिसाब कार्यों को काफी प्रसिद्धि मिली। यह ठीक है कि मधु कोड़ा पकड़े गये, कुछ और मंत्री पकड़े गये, पर यह संख्या कुछ भी नहीं है। यह संख्या सैंकड़ों में हो सकती है। अरबों-खरबों की सम्पत्ति हो सकती है। झारखंड की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है और झारखंड के मंत्री अरबों में खेलते-खाते रहे। यह ठीक है कि जो पकड़े गये, उन पर छानबीन बरसों चलेगी। यदि कोई राजनीति हस्तक्षेप या राजनैतिक सौदेबाजी नहीं हुई, तो सजा भी मिल सकती है। सम्पत्ति भी जब्त हो सकती है। पर क्या इससे झारखंड की जनता के साथ भावनाओं से किये गये खिलवाड़ की भरपाई हो पायेगी? नेताओं की नैतिकता का इतना पतना हो गया है कि वे सजा से धबड़ाते तक नहीं। चारा घोटाला से या और भी कोई घोटाला रहा हो, किसी से किसी ने कुछ भी नहीं सीखा। न डर लगा सब यही कहते हैं। इससे क्या होगा? राजनीति में निडरता ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है और यही हो भी रहा है। चुनाव होने वाला है। यह तो समय ही बतलाएगा कि कौन-कौन चुनकर आते हैं, पर जो चुनकर आयेंगे उनकी क्या गारंटी कि वे इस परम्परा से अलग हट कर नई, जनहितकारी और ईमानदार परम्परा को विकसित करेेंगे! झारखंड की जनता लूटी जाती है, तो इसलिए कि वह सीधी-सादी है, गूंगी है, वह विरोध या विद्रोह नहीं करती। आज जनता में इतनी समझ या विरोध-विद्रोह करने की समझ होती, तो मधु कोड़ा एण्ड कम्पनी या और कोई हो इन लोगों की इतनी हिम्मत ही नहीं होती। जिन राज्य की जनता मरी होती है, वहाँ इसी तरह से राज्य चलता है और चलता रहेगा। दोष जनता का ही नहीं देश को चलाने वाली पार्टियों का भी है। छोटी से छोटी बातों को लेकर जुलूस और जलसा करने वाले,सड़कों पर बैनर देकर बेजुबान लोगों को सड़क पर उतार कर नारे लगाने और लगवाने वाले सभी की बोलती बंद है, तो इस लिए कि मधु कोड़ा के पत्तल से जूठन सबने खाये हैं।
विश्री